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प्रवासी मजदूरों की व्यथा पर बोले के.एन.गोविन्दाचार्य, जीडीपी ग्रोथ रेट के आंकड़ों से भारत आर्थिक महाशक्ति नहीं हो सकता

प्रवासी मजदूर

प्रवासी मजदूरों की अवस्था पर बोले वरिष्ठ आर्थिक-सामाजिक चिंतक के.एन.गोविन्दाचार्य-“जंजीर की मजबूती उसकी मजबूत कड़ियों से नहीं बल्कि उसकी सबसे कमजोर कड़ी से ही आंकी जायेगी।”

 नई दिल्ली/एसबीएम

प्रवासियों की जिंदगी का प्रश्न

प्रवासी मजदूरों की स्थिति से व्यथित के,एन.गोविन्दाचार्य ने कहा है कि, अपने देश की सबसे ज्यादा असुरक्षित और कमजोर कड़ी है “असंगठित क्षेत्र में जिंदगी”। अपनी जिंदगी किसी तरह अपने आतंरिक, व्यक्तिगत और सामाजिक ताकत से चला रहे मजदूर, कारीगर, छोटे सीमांत किसान और छिट-फूट अनियमित व्यापार से स्व-रोजगारिये लोगों के बारे में सोचना पड़ेगा।

जीडीपी की गणित से समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला

उन्होंने कहा कि असंगठित लोगों की संख्या अनुमानतः 45 करोड़ तो पड़ती ही है। वे सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध और आर्थिक दृष्टि से विपन्न है। यही हमारे देश की वह कमजोर कड़ी है। इसे मजबूत किये बगैर केवल जीडीपी ग्रोथ रेट के आंकड़ों से भारत आर्थिक महाशक्ति नहीं हो सकता।  उन्होंने आगे कहा कि इस क्रम मे यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि विकास के बारे मे कई बार आंकड़ों का खेल भुलावा और छलावा का राजनैतिक खेल बन जाता है। पढ़े लिखे जानकार लोगों के बुद्धिविलास की विषयवस्तु बन जाती है। उन्होंने कहा कि, इस कमजोर कड़ी की स्थितियों को जानना, समझना जरूरी है। तभी जमीनी जरूरते समझ में आयेंगी।

मोबाइल इनके लिए मनोरंज का साधन मात्र है

प्रवासियों की जीवन शैली को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि “इनकी जीवनशैली में मोबाइल, बैंक अकाउंट का उपयोग कुछ अलग तरह से होता है। गाँव-घर से संपर्क का मुख्य माध्यम बन जाता है,  साथ ही मन तकलीफों से भटकाने या मन लगाने के उपकरण के नाते मनोरंजन की विधा में काम आता है।” समाचार पत्रों, वेबपोर्टल को डाउनलोड करने के काम नहीं आता।

ये स्वभावतः आत्मनिर्भर हैं

उन्होंने कहा कि, हमें यह समझना होगा कि असंगठित लोगों के पास गां-घर, पैसे भेजने के भी अपने अनौपचारिक इंतजाम होते है। सोशल डिस्टेंसिंग, घरों में रहने का आग्रह आदि शब्द इस धरातल पर अनबूझ रह जाते हैं। उनको अपने घर का बजट, कमाई में खर्च की बजाय बचत का गणित तो बैंकों और सरकारी पैसे पर निर्भर कॉर्पोरेटिये से बेहतर समझ में आता है। दरअसल वे आत्मनिर्भर स्वभाव संस्कार से हैं, नीति निर्देश से नहीं।”

सहयोग रूपी संबल की है जरूरत

उन्होंने कहा कि “ ऐसे में उन्हें, सहयोग रूपी संबल की जरुरत है। इस आबादी को केंद्र बिन्दु बनाकर सोचेंगे तो विकास की वर्णमाला का “क”, “ख”, “ग” होगा कि इस वर्ग के हर बच्चे को रोज आधा किलो दूध, आधा किलो फल और आधा किलो सब्जी इसे आधार बनाकर विकास की योजना, बजट, धन-साधन आवंटन, देशी तरीके से हो न कि घुमा-फिराकर द्राबिड़ी प्राणायाम से।

समाधान

समाधान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि, अभी कोरोना संकट में सबसे बड़ी जरुरत है कि इस तबके के हाथ पैसा सीधे पहुंचे। कोरोना के बाद की स्थितियों में भारत के आर्थिक विकास के अनोखे क्रम में कृषि, गोपालन वाणिज्य को महत्त्व देना होगा और उसमें गोवंश को प्रतिष्ठा का स्थान देना होगा।

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