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‘भारतीयता’ का वाहक बन रहा है कोरोना!

यदि भविष्य की तरफ देखें तो शायद सनातनी संस्कृति और भारतीयता की अवधारणा को वैश्विक मान्यता दिलवाने का माध्यम कोरोना बनने जा रहा है। एक ओर भारतीय चिंतन आध्यामिक उन्नति पर आधारित है तो पश्चिमी चिंतन पूंजी को सफलता का मापदंड मानता रहा है। भोगवाद और पूंजीवाद के मोह को एक छोटे से वाइरस ने हिला कर रख दिया है।

 

अमित त्यागी

 

इस समय सम्पूर्ण विश्व कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है। विश्व के बड़े और विकसित देश इस महामारी के आगे अपने हाथ खड़े कर चुके हैं। आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित अस्पताल एवं वैज्ञानिक उपकरण कोरोना के आगे बेबस हो गए हैं। एक छोटे से वाइरस ने पूरी मानवता को चुनौती दे दी है। विकास की राह के सभी मानक ध्वस्त हो गए हैं। कारखानों में तालाबंदी है। चौड़ी-चौड़ी सड़कें सूनी पड़ी हैं। महंगी कारे घर में शो पीस बनी खड़ी हैं। आलीशान मकान और ऊंची अट्टालिकाएं प्रकृति से मनुहार करती दिख रही है।

इस बार प्रकृति ने चुनौती दी है

विकास की राह पर प्रकृति को चुनौती देने वाली जीवन शैली एकाएक याचक की भूमिका में आ गयी है। एक ओर भारत को पिछड़ा बताकर विदेशों में जा बसने वाले लोग अब भारत की आत्मीयता को याद कर रहे हैं तो शहरीकरण को सफलता का मापदंड मानने वाले अपने गांव वापस जा रहे हैं। सनातन संस्कृति की जीवन शैली को पीछे छोड़कर और पाश्चात्य शैली को विकास मानकर जिस रास्ते पर हम आगे बढ़ गए हैं उसके कारण ही मानवता के विनाश का यह दिन देखना पड़ा है।

प्रकृति भी दंड देने के लिए क्रूर हो जाती है

चूंकि अपने साथ हो रहे अन्यायों को प्रकृति ज़्यादा देर तक सहन नहीं करती है इसलिए प्राकृतिक आपदाओ के रूप मे वो मानवता के अस्तित्व को चुनौती दे ही देती है। प्रकृति अपने साथ हुई क्रूरता का बदला क्रूरतम तरीके से लेती है। कोरोना के माध्यम से उपजी चिंताओं की एक वजह प्राकृतिक असंतुलन है तो समाधान योग और आयुर्वेद में छिपा है। योग और आयुर्वेद सनातन जीवन शैली पर आधारित है जिसकी परिकल्प्ना आध्यात्मिक कल्याण के द्वारा शारीरिक, मानसिक और सामाजिक उत्थान के साथ-साथ नैतिक पक्ष को मजबूत करने पर आधारित रही है। एक ओर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान बाह्य स्रोतों से शरीर की जरूरत पूरी करने पर आधारित हैं वहीं दूसरी और आयुर्वेद स्वास्थ्य को जीवन शैली से जोड़कर इसको जीवन का ही एक अभिन्न अंग बना देता है।

प्रकृति से है रोग प्रतिरोधक क्षमता का संबंध

हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का सीधा संबंध प्रकृति से है। हम जितना प्रकृति के करीब रहेंगे उतना ही हमारा शरीर रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है। मानवता को जीवन की आवश्कतानुसार प्रकृति ने अथाह प्राकृतिक संसाधन दिये हैं। प्रकृति हमसे अपना संरक्षण एवं संवर्धन सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्वहन भी चाहती थी। बस यहीं मानव से चूक हो गयी।

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प्रातः काल का स्वास्थ्य से महत्व

प्रात: काल ब्रह्म-मुहूर्त मे उठते ही आयुर्वेद अपने प्रभाव में आ जाता है। सुबह सवेरे योग क्रियाएं इसका पहला भाग है। दूसरे भाग में आहार का स्थान है। शाकाहारी भोजन में नियमित रूप से प्रयुक्त होने वाले मसाले जैसे हींग, कलौंजी, अदरक, मैथी, अजवाइन, काली मिर्च आदि स्वयं में एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां हैं। जिनके द्वारा पाचन के लिए आवश्यक अग्नि संतुलित रहती है। संस्कार एवं शिक्षा इसका तीसरा भाग है जिसके द्वारा मानसिक उन्नति सुनिश्चित होती है और नैतिकता का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तरह से आयुर्वेद का आध्यात्मिक चक्र पूर्ण होता है।

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स्वास्थ्य पर विचारों का प्रभाव

इसके साथ ही विचारों का शरीर पर सीधा प्रभाव होता है। मनोवैज्ञानिक और चिकित्सक भी अब इस बात को स्वीकार कर रहे हैं मनुष्य की चिंतन शैली मे असंतुलन से प्राणों की गति प्रभावित होती है। इस असंतुलन का परिणाम सम्पूर्ण शरीर पर दुष्प्रभाव डालता है। प्रतिकूल मनोदशा मे खाया हुआ अन्न शरीर में ठीक से पचता नहीं है जो आधि/मानसिक रोग पैदा करते हैं। ये आधि ही धीरे धीरे बढ़कर व्याधि/शारीरिक रोग पैदा कर देते हैं। विचारों की शुद्धता के महत्व को योग वशिष्ठ 6/1/81/30-37 मे समझाया गया है। “चित्त मे उत्पन्न विकार से ही शरीर मे रोग उत्पन्न होते हैं। शारीरिक क्षोभ की स्थिति में नाड़ियों के परस्पर संबंधता में विकार आ जाते हैं, जो रोग का कारण बनते हैं। ”

मनोवृति के आधार पर होती हैं बीमारियां

मनोस्थिति और शरीर के रोगों पर डॉ क्रेन्स डेलमार और डॉ राओ द्वारा शोध किए गए थे। उनके शोधों के द्वारा कुछ रोचक परिणाम सामने आए थे। उनके शोध का सार था कि स्वस्थ मन होने पर तन में कोई रोग नहीं हो सकता है। उनके कुछ निष्कर्ष यूं थे।

  • हिस्टीरिया जैसे रोग चोर उचक्के, हताश-निराश और दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को होता है।
  • दूसरों में दोषारोपण एवं छिद्र-अन्वेषण करने वाले लोगों मे कैंसर होता है।
  • गठिया का मूल कारण ईर्ष्या है।
  • जो लोग दूसरों को हमेशा परेशान करने मे लगे रहते हैं उन्हे ठंड ज़्यादा लगती है।
  • स्नायुशूल पर उनका निष्कर्ष था कि इसके रोगी व्यावहारिक जीवन मे आवश्यकता से अधिक स्वार्थी, खुदगर्ज़ एवं हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं।
  • अजीर्ण रोग झगड़ालू लोगों को होता है।
भारतीयता की अवधारणा का वाहक बन रहा है कोरोना!

यदि भविष्य की तरफ देखें तो शायद सनातनी संस्कृति और भारतीयता की अवधारणा को वैश्विक मान्यता दिलवाने का माध्यम कोरोना बनने जा रहा है। एक ओर भारतीय चिंतन आध्यामिक उन्नति पर आधारित है तो पश्चिमी चिंतन पूंजी को सफलता का मापदंड मानता रहा है। भोगवाद और पूंजीवाद के मोह को एक छोटे से वाइरस ने हिला कर रख दिया है।

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भारतीयता ही समाधान है

कोरोना के प्रकरण के बाद अब जब हम अपने चारों तरफ की समस्याओं के समाधान का मार्ग ढूंढते हैं तो सनातन जीवन शैली में हमें उसका उपचार प्राप्त होता है। अब देखना यह है कि कोरोना के बाद हम भारतीय एवं विश्व कितना सनातनी शैली को आत्मसात करते हैं।

( लेखक विधि विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं। )

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